क्या एक नाबालिग भागीदार हो सकता है:-
भागीदारी अधिनियम की धारा 5 के अनुसार भागीदारी का जन्म संविदा से होता है ना की स्थिति (status) से। इसीलिए भागीदारी के निर्माण के लिए संविदा का होना जरूरी है लेकिन संविदा अधिनियम की धारा 11 के अनुसार एक नाबालिग के द्वारा किया गया करार शून्य होता है। इसी के कारण कोई भी नाबालिग फर्म का भागीदार नहीं बन सकता।
केस- मोहरी बीबी बनाम धर्मदास घोष- इस मामले में जस्टिस लॉर्डनॉर्थ ने कहा कि एक नाबालिग संविदा करने के लिए असक्षम माना जाता है और उसके द्वारा किया गया करार प्रारंभ से ही शून्य होता है।
भारतीय वयस्कता अधिनियम 1875 की धारा 3 में वयस्कता की आयु 18 वर्ष और विशेष परिस्थितियों में 21 वर्ष निर्धारित की गई है। भारतीय विधि के अनुसार एक नाबालिग भागीदार नहीं बन सकता।
इस संबंध में भागीदारी अधिनियम की धारा 30 (1) स्पष्ट रूप से कहती है कि हर व्यक्ति जो नाबालिग है किसी फर्म में भागीदार नहीं हो सकता लेकिन सभी भागीदारों की सहमति से भागीदारी के लाभों के लिए उसे फर्म में प्रवेश दिया जा सकता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कोई नाबालिग भागीदारी के लाभों में शामिल किया जा सकता है। इसके लिए यह जरूरी है कि कम से कम दो व्यक्तियों द्वारा संविदा करके भागीदारी का निर्माण किया गया हो।
उदाहरण– यदि A और B दोनों मिलकर भागीदारी की संविदा करते हैं। उनमें से A की मृत्यु हो जाए तो अकेला B भागीदारी का निर्माण नहीं कर सकता क्योंकि भागीदारी की संविदा के लिए कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरूरी है।
केस- श्रीराम शारदामल बनाम गौरी शंकर– यदि फर्म में केवल दो ही भागीदार हैं और उनमें से एक की मृत्यु हो जाती है तो बचा हुआ व्यक्ति किसी नाबालिग को लाभ में हिस्सेदार नहीं बना सकता है।
केस- इनकम टैक्स कमिश्नर बनाम शाहमोहन दास (1966) उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नाबालिग का संरक्षक नाबालिग की तरफ से लाभ स्वीकार कर सकता है।
नाबालिग की फर्म में स्थिति:- किसी नाबालिग के फर्म के लाभों में शामिल हो जाने के बाद उसकी स्थिति अधिकार और कर्तव्य इस प्रकार के होते हैं-
1) नाबालिग की अवधि में कर्तव्य और अधिकार–
i) लाभ के लिए प्रवेश:- धारा 30 (1) के अनुसार हालांकि नाबालिग को फर्म में भागीदार नहीं बनाया जा सकता लेकिन उसे फर्म के लाभों में शामिल किया जा सकता है बशर्ते कि सभी भागीदारी सहमत हो।
ii) लाभ और संपत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार– धारा 30 (2) के अनुसार ऐसे नाबालिग को फर्म की संपत्ति और उसके लाभ में उतना अंश प्राप्त करने का अधिकार होता है जितना कि संविदा में निश्चित किया गया हो।
iii) हिसाब-किताब देखने का अधिकार– धारा 30 (2) के अनुसार ऐसे नाबालिग को फर्म का हिसाब किताब देखने और उसकी नकल करने का अधिकार होता है।
2) नाबालिग की अवधि में दायित्व– भागीदारी अधिनियम की धारा 34 (3) के अनुसार हालांकि एक नाबालिग का कोई दायित्व नहीं होता लेकिन फिर भी उसका दायित्व उसके लाभ के अंश तक सीमित होता है।
3) नाबालिग के बालिग हो जाने के बाद अधिकार और दायित्व– धारा 30 (2) के अनुसार नाबालिग के बालिग हो जाने पर उसे चुनाव का अधिकार मिलता है। इसके अनुसार जब कोई नाबालिग बालिग हो जाता है और उसे इस बात का पता चलता है कि उसे फर्म के लाभों में शामिल किया जा चुका है तो उस तारीख से 6 महीने के अंदर इस आशय की एक सार्वजनिक सूचना उसे देनी होगी कि वह फर्म में भागीदार बना रहना चाहता है या नहीं। यदि वह ऐसी सूचना नहीं देता है तो 6 महीने की अवधि समाप्त होने के बाद वह स्वयं ही फार्म का भागीदार बन जाएगा।
क) यदि वह भागीदार बनना स्वीकार करता है तो उसके अधिकार और दायित्व उस तारीख से अन्य बालिग भागीदारों के समान ही हो जाएंगे, लेकिन तीसरे पक्षकार के लिए उसका व्यक्तिगत दायित्व उन कार्यों के लिए होगा जो फर्म द्वारा उसके नाबालिग रहने के दौरान किए गए हैं।
ख) यदि वह भागीदार बनना स्वीकार नहीं करता तो धारा 30 के अनुसार उसके अधिकार और दायित्व-
i) उसके द्वारा की गई सार्वजनिक सूचना दिए जाने की तारीख तक वही रहेंगे जो नाबालिग के हैं। इस तारीख के बाद के कार्यों के लिए वह या उसका अंश उत्तरदाई नहीं होगा।
ii) वाद दायर करने का अधिकार– धारा 30 (8) (स) के अनुसार एक फर्म में अपनी संपत्ति और लाभो में हिस्सा प्राप्त करने के लिए नाबालिग को वाद दायर करने का अधिकार मिल जाता है।
iii) प्रदर्शन करने का दायित्व धारा 30 (9) के अनुसार यदि वह फर्म से अलग हो जाने के बावजूद भी खुद को एक भागीदार के रूप में प्रदर्शित करता है तो वह तीसरे पक्षकार के प्रति अन्य भागीदारों के समान ही दायीं होगा भले ही वह भागीदार ना रहने की सूचना दे चुका हो।
नाबालिग की अयोग्यताएं-
1) नाबालिग को पूरी तरह से भागीदार किसी भी तरीके से नहीं बनाया जा सकता है।
2) उसे दिवालिया घोषित नहीं किया जा सकता है लेकिन फर्म में उसके हिस्से को रिसीवर प्राप्त कर सकता है।
3) वह अकाउंट बुक के अलावा अन्य किसी ऐसी पुस्तक का निरीक्षण नहीं कर सकता जिसमें कुछ गुप्त बातें शामिल होती हैं।
4) वह अकाउंट के लिए वाद प्रस्तुत करने में तब तक निर्याग्य माना जाता है जब तक वह फर्म से अलग नहीं हो जाता।

