भागीदारी के अस्तित्व को निर्धारित करने के तरीके- (Modes of Partnership)

भागीदारी के अस्तित्व को निर्धारित करने के तरीके-

भागीदारी के संबंध का अस्तित्व है या नहीं इसका निर्धारण पक्षकारों के बीच उनकी संविदा पर निर्भर होना जरूरी है। केवल भागीदारी शब्द का प्रयोग करने से भागीदारी नही मानी जायेगी। कोई भागीदारी है या नही यह विधि और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है। यह तय करने के लिए कि व्यक्तियों का कोई समूह भागीदारी है या नहीं या कोई व्यक्ति किसी फर्म का भागीदार है या नहीं पक्षकारों के बीच वास्तविक संबंध का ध्यान रखा जाएगा।

भागीदारी अधिनियम की धारा 6 के स्पष्टीकरण 2 में यह कहा गया है कि वह व्यक्ति जो कारोबार में लाभ प्राप्त करते हैं लेकिन भागीदार नहीं होते अगर उनके बीच पारस्परिक एजेंसी नहीं है।

स्पष्टीकरण 2 में ऐसे व्यक्तियों का वर्णन किया गया है जो हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी होते हुए भी भागीदारी नहीं कहे जा सकते-

1)  संयुक्त स्वामियों में संपत्ति के लाभ का विभाजन– धारा 6 के स्पष्टीकरण (1) में कहा गया है कि यदि किसी संपत्ति के कई स्वामी है तो उन संयुक्त स्वामियों या संपत्ति में सामान्य हित रखने वाले व्यक्तियों में संपत्ति के लाभ को यदि आपस में बांट लिया जाए तो उससे भागीदारी का निर्माण नहीं हो जाता या वे भागीदार नहीं बन जाते।

2) ऋणदाताओ द्वारा लाभ में हिस्सा लेना- केवल ऋणदाता जो किसी व्यापार या फर्म व्यापार के रूप में कोई धन इस शर्त पर लगाते हैं कि वह ब्याज के बदले फर्म से या व्यापार में होने वाले लाभ में हिस्सा लेंगे तो ऐसा व्यक्ति भागीदार नहीं हो सकता।

3) सेवक या अभिकर्ता द्वारा लाभ में हिस्सा लेना- कभी-कभी सेवक और अभिकर्ता को फर्म या व्यापार में कार्य करने के बदले में वेतन की बजाय व्यापार में होने वाले लाभ का हिस्सा दिया जाता है लेकिन इस प्रकार लाभ में हिस्सा प्राप्त करने के कारण ही वह फर्म या व्यापार के भागीदार नहीं हो जाते हैं।

4) मृतक भागीदार की विधवा या संतान द्वारा वार्षिकी के रूप में लाभ में हिस्सा लेना– यदि किसी मृतक भागीदार की विधवा या बच्चों को वार्षिकी के रूप में फर्म के कारोबार के लाभ का कुछ हिस्सा दिया जाता है तो केवल इस आधार पर ही उन्हें फर्म का भागीदार नहीं माना जा सकता।

5) गुडविल (साख) के विक्रेता द्वारा लाभ में हिस्सा लेना– जब किसी व्यापार का स्वामी अपने व्यापार की प्रसिद्ध (ख्याति) दूसरों को बेच देता है और उसके बदले में वह जो भी प्रतिफल के रूप में व्यापार में होने वाले लाभ में हिस्सा ले प्राप्त करता है तो इस प्रकार लाभ में हिस्सा प्राप्त करने पर वह उस व्यापार में भागीदार नहीं हो जाता।

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